Dr. Mahendra Bhatnagar Ki Kavya-Srishti

शुक्रवार, 28 मार्च 2008

आहत युग

महेंद्र भटनागर का कविता संग्रह : आहत युग



आहत युग


-महेंद्र भटनागर

(1) संग्राम; और
जिस स्वप्न को
साकार करने के लिए —
सम्पूर्ण पीढ़ी ने किया
संघर्ष
अनवरत संघर्ष,
सर्वस्व जीवन-त्याग;
वह
हुआ आगत !
*
कर गया अंकित
हर अधर पर हर्ष,
चमके शिखर-उत्कर्ष !
प्रोज्ज्वल हुई
हर व्यक्ति के अंतःकरण में
आग,
अभिनव स्फूर्ति भरती आग !
संज्ञा-शून्य आहत देश
नूतन चेतना से भर
हुआ जाग्रत,
सघन नैराश्य-तिमिराच्छन्न कलुषित वेश
बदला दिशाओं ने,
हुआ गतिमान जन-जन
स्पन्दन-युक्त कण-कण !
*
आततायी निर्दयी
साम्राज्यवादी शक्ति को
लाचार करने के लिए —
नव-विश्वास से ज्योतित
उतारा था समय-पट पर
जिस स्वप्न का आकार
वह,
हाँ, वह हुआ साकार!
*
लेकिन तभी....
अप्रत्याशित-अचानक
तीव्रगामी / धड़धड़ाते / सर्वग्राही,
स्वार्थ-लिप्सा से भरे
भूकम्प ने
कर दिए खंडित —
श्रम-विनिर्मित
गगन-चुम्बी भवन,
युग-युग सताये आदमी के
शान्ति के, सुख के सपन !
*
इसलिए; फिर
दृढ़ संकल्प करना है,
वचन को पूर्ण करना है,
विकृत और धुँधले स्वप्न में
नव रंग भरना है,
कमर कस कर
फिर कठिन संघर्ष करना है !
ƹ ƹ
(2) अमानुषिक
आज फिर
खंडित हुआ विश्वास,
आज फिर
धूमिल हुई
अभिनव ज़िन्दगी की आस !
*
ढह गये
साकार होती कल्पनाओं के महल !
बह गये
अतितीव्र अतिक्रामक
उफनते ज्वार में,
युग-युग सहेजे
भव्य-जीवन-धारणाओं के अचल !
*
आज छाये; फिर
प्रलय-घन,
सूर्य- संस्कृति-सभ्यता का
फिर ग्रहण-आहत हुआ,
षड्यंत्रों-घिरा
यह देश मेरा
आज फिर
मर्माहत हुआ !
*
फैली गंध नगर-नगर
विषैली प्राणहर बारूद की,
विस्फोटकों से
पट गयी धरती,
सुरक्षा-दुर्ग टूटे
और हर प्राचीर
क्षत-विक्षत हुई !
*
जन्मा जातिगत विद्वेष,
फैला धर्मगत विद्वेष,
भूँका प्रांत-भाषा द्वेष,
गँदला हो गया परिवेश !
सर्वत्र दानव वेश !
घुट रही साँसें
प्रदूषित वायु,
विष-घुला जल
छटपटाती आयु !
ƹ ƹ
(3) फतहनामा
आतंक सियापा !
छलनी / खून-सनी
बेगुनाह लाशें,
खेतों-खलियानों में
छितरी लाशें,
सड़कों पर
बिखरी लाशें !
*
निरीह
माँ, पत्नी, बहनें, पुत्रियाँ,
पिता, बन्धु, मित्र, पड़ोसी —
रोके आवेग
थामे आवेश
नत मस्तक
मूक विवश !
*
जश्न मनाता
पूजा-घर में
सतगुरु-ईश्वर-भक्त
खु़दा-परस्त !
ƹ ƹ
(4) त्रासदी
दहशत : सन्नाटा
दूर-दूर तक सन्नाटा !
*
सहमे-सहमे कुत्ते
सहमे-सहमे पक्षी
चुप हैं।
*
लगता है-
क्रूर दरिन्दों ने
निर्दोष मनुष्यों को फिर मारा है,
निर्ममता से मारा है !
रातों-रात
मौत के घाट उतारा है !
सन्नाटे को गहराता
गूँजा फिर मज़हब का नारा है !
ख़तरा,
बेहद ख़तरा है !
*
रात गुज़रते ही
घबराए कुत्ते रोएंगे,
भय-विह्वल पक्षी चीखेंगे !
*
हम
आहत युग की पीड़ा सह कर
इतिहासों का मलबा ढोएंगे !
ƹ ƹ
(5) होगा कोई
एक आदमी / झुका-झुका / निराश
दर्द से कराहता हुआ
तबाह ज़िन्दगी लिए
गुज़र गया।
*
एक आदमी / झुका-झुका / हताश
चोट से लहूलुहान
चीखता हुआ / पनाह माँगता / अभी-अभी
गुज़र गया।
ƹ ƹ
(6) हॉकर से
यह क्या
रोज़-रोज़
तरबतर खून से
अख़बार फेंक जाते हो तुम
घर में मेरे ?
*
तमाम हादसों से रँगा हुआ
अंधाधुंध गोलियों के निशान
पृष्ठ-पृष्ठ पर स्पष्ट उभरते !
*
छूने में.....पढ़ने में इसको
लगता है डर,
लपटें लहराता
जहर उगलता
डसने आता है अख़बार !
*
यद्यपि
यही ख़बर सुन कर
सोता हूँ हर रात
कि कोई कहीं
अप्रिय घटना नहीं घटी,
तनाव है
किन्तु नियंत्रण में है सब !
(7) आत्मघात
हम खुद
तोड़ रहे हैं अपने को !
ताज़्जुब कि
नहीं करते महसूस दर्द !
इसलिए कि
मज़हब का आदिम बर्बर उन्माद
नशा बन कर
हावी है
दिल पर सोच-समझ पर।
हम ख़ुद
हथगोले फोड़ रहे हैं अपने ही ऊपर !
पागलपन में
अपने ही घर में
बारूद बिछा कर सुलगा आग रहे हैं
अपने ही लोगों पर करने वार-प्रहार !
*
हम ख़ुद
छोड़ रहे हैं रूप आदमी का
और पहन आये हैं खालें जानवरों की
गुर्राते हैं
छीनने-झपटने जानें
अपने ही वंशधरों की !
(8) लोग
चल रहे हैं लोग
सिर्फ़ पीछे भीड़ के !
*
जाना कहाँ
नहीं मालूम,
हैं बेख़बर
निपट महरूम,
*
घूमते या इर्द -
गिर्द अपने नीड़ के !
*
छाया इधर-
उधर जो शोर,
आया कहीं
न आदमखोर ?
*
सरसराहट आज
जंगलों में चीड़ के !
(9) आपात्काल
तूफ़ान
अभी गुज़रा नहीं है !
बहुत कुछ टूट चुका है
टूट रहा है,
मनहूस रात
शेष है अभी !
*
जागते रहो
हर आहट के प्रति सजग
जागते रहो !
न जाने
कब.....कौन
दस्तक दे बैठे —
शरणागत।
*
ज़हर उगलता
फुफकारता
आहत साँप-सा तूफ़ान
आख़िर गुज़रेगा !
सब कुछ लीलती
घनी स्याह रात भी
हो जाएगी ओझल !
*
हर पल
अलस्सुबः का इंतज़ार
अस्तित्व के लिए !
(10) जागते रहना
जागते रहना, जगत में भोर होने तक !
*
छा रही चारों तरफ़ दहशत
रो रही इंसानियत आहत
वार सहना, संगठित जन-शोर होने तक !
*
मुक्त हो हर व्यक्ति कारा से
जूझना विपरीत धारा से
जन-विजय संग्राम के घनघोर होने तक !
*
मौत से लड़ना, नहीं थकना
अंत तक बढ़ना नहीं रुकना
हिंसकों के टूटने - कमज़ोर होने तक !
(11) ज़रूरी
इस स्थिति को बदलो
कि आदमी आदमी से डरे,
इन हालात को हटाओ
कि आदमी आदमी से नफ़रत करे !
*
हमारे बुज़ुर्ग
हमें नसीहत दें कि
बेटे, साँप से भयभीत न होओ
हर साँप ज़हरीला नहीं होता,
उसकी फूत्कार सुन
अपने को सहज बचा सकते हो तुम।
हिंस्र शेर से भी भयभीत न होओ
हर शेर आदमखोर नहीं होता,
उसकी दहाड़ सुन
अपने को सहज बचा सकते हो तुम !
पशुओं से, पक्षियों से
निश्छल प्रेम करो,
उन्हें अपने इर्द-गिर्द सिमटने दो
अपने तन से उन्हें लिपटने दो,
कोशिश करो कि
वे तुमसे न डरें
तुम्हें देख न भगें,
पंख फड़फड़ा कर उड़ान न भरें,
चाहे वह
चिड़िया हो, गिलहरी हो, नेवला हो !
*
तुम्हारे छू लेने भर से बीरबहूटी
स्व-रक्षा हेतु
जड़ बनने का अभिनय न करे !
तुम्हारी आहट सुन
खरगोश कुलाचें भर-भर न छलाँगे
सरपट न भागे !
*
लेकिन
दूर-दूर रहना
सजग-सतर्क
इस आदमजाद से !
जो-
न फुफकारता है, न दहाड़ता है,
अपने मतलब के लिए
सीधा डसता है,
छिप कर हमला करता है !
कभी-कभी यों ही
इसके-उसके परखचे उड़ा देता है !
फिर चाहे वह
आदमी हो, पशु हो, पक्षी हो,
फूल हो, पत्ती हो, तितली हो, जुगनू हो !
*
अपना, बस अपना
उल्लू सीधा करने
यह आदमी
बड़ा मीठा बोलता है,
सुनने वाले कानों से मधुरस घोलता है !
*
लेकिन
दबाए रखता है विषैला फन,
दरवाजे पर सादर दस्तक देता है,
'जयराम जी‘ की करता है !
तुम्हारे गुण गाता है !
और फिर
सब कुछ तबाह कर
हर तरफ से तुम्हें तोड़ कर
तडपने-कलपने छोड़ जाता है !
*
आदमी के सामने ढाल बन कर जाओ,
भूखे-नंगे रह लो
पर, उसकी चाल में न आओ !
ऐसा करोगे तो
सौ बरस जिओगे, हँसोगे, गाओगे !
*
इस स्थिति को बदलना है
कि आदमी आदमी को लूटे,
उसे लहूलुहान करे,
हर कमज़ोर से बलात्कार करे,
निर्द्वन्द्व नृशंस प्रहार करे,
अत्याचार करे !
और फिर
मंदिर, मसज़िद, गिरजाघर, गुरुद्वारा जाकर
भजन करे,
ईश्वर के सम्मुख नमन करे !
*
(12) इतिहास का एक पृष्ठ
सच है —
घिर गये हैं हम
चारों ओर से
हर क़दम पर
नर-भक्षियों के चक्रव्यूहों में,
भौंचक-से खड़े हैं
लाशों-हड्डियों के
ढूहों में !
*
सच है —
फँस गये हैं हम
चारों ओर से
हर क़दम पर
नर-भक्षियों के दूर तक
फैलाए-बिछाए जाल में,
छल-छद्म की
उनकी घिनौनी चाल में !
*
बारूदी सुरंगों से जकड़ कर
कर दिया निष्क्रिय
हमारे लौह-पैरों को
हमारी शक्तिशाली दृढ़ भुजाओं को !
भर दिया घातक विषैली गंध से
दुर्गन्ध से
चारों दिशाओं की हवाओं को !
*
सच है -
उनके क्रूर पंजों ने
है दबा रखा गला,
भींच डाले हैं
हर अन्याय को करते उजागर
दहकते रक्तिम अधर !
मस्तिष्क की नस-नस
विवश है फूट पड़ने को,
ठिठक कर रह गये हैं हम !
खंडित पराक्रम
अस्तित्व / सत्ता का अहम् !
*
सच है कि
आक्रामक-प्रहारक सबल हाथों की
जैसे छीन ली क्षमता त्वरा —
अब न हम ललकार पाते हैं
न चीख पाते हैं,
स्वर अवरुद्ध
मानवता-विजय-विश्वास का,
सूर्यास्त जैसे
गति-प्रगति की आस का !
अब न मेधा में हमारी
क्रांतिकारी धारणाओं-भावनाओं की
कड़कती तीव्र विद्युत कौंधती है,
चेतना जैसे
हो गयी है सुन्न जड़वत् !
*
चेष्टाहीन हैं / मजबूर हैं,
हैरान हैं,
भारी थकन से चूर हैं !
*
लेकिन
नहीं अब और
स्थिर रह सकेगा
आदमी का आदमी के प्रति
हिंसा-क्रूरता का दौर !
*
दृढ़ संकल्प करते हैं
कठिन संघर्ष करने के लिए,
इस स्थिति से उबरने के लिए !
*
(13) वसुधैवकुटुम्बकम्
जाति, वंश, धर्म, अर्थ के नामाधार पर
आदमी आदमी में करना
भेद-विभेद,
किसी को निम्न
किसी को ठहराना श्रेष्ठ,
किसी को कहना अपना
किसी को कहना पराया —
आज के उभरते-सँवरते नये विश्व में
गंभीर अपराध है,
अक्षम्य अपराध है।
*
करना होगा नष्ट-भ्रष्ट
ऐसे व्यक्ति को / ऐसे समाज को
जो आदमी-आदमी के मध्य
विभाजन में रखता हो विश्वास
अथवा
निर्धनता चाहता हो रखना क़ायम।
*
सदियों के अनवरत संघर्ष का
सह-चिन्तन का
निष्कर्ष है कि
हमारी-सबकी
जाति एक है — मानव,
हमारा-सबका
वंश एक है — मनु-श्रद्धा,
हमारा-सबका
धर्म एक है — मानवीय,
हमारा-सबका
वर्ग एक है — श्रमिक।
*
रंग रूप की विभिन्नता
सुन्दर विविधरूपा प्रकृति है,
इस पर विस्मय है हमें
इस पर गर्व है हमें,
सुदूर आदिम युग में
लम्बी सम्पर्क दूरियों ने
हमें भिन्न-भिन्न भाषा-बोल दिए,
भिन्न-भिन्न लिपि-चिह्न दिए।
*
किन्तु आज
इन दूरियों को
ज्ञान-विज्ञान के आलोक में
हमने बदल दिया है नज़सदीकियों में,
और लिपि-भाषा भेद का अँधेरा
जगमगा दिया है
पारस्परिक मेल-मिलाप के प्रकाश में,
मैत्री-चाह के अदम्य आवेग ने
तोड़ दी हैं दीवारें / रेखाएँ
जो बाँटती हैं हमें
विभिन्न जातियों, वंशों, धर्मों, वर्गों में।
(14) भ्रष्टाचार
गाजर घास-सा
चारों तरफ़
क्या खूब फैला है !
देश को हर क्षण
पतन के गर्त में
गहरे ढकेला है,
करोड़ों के
बहुमूल्य जीवन से
क्रूर वहशी
खेल खेला है !
*
वर्जित गलित
व्यवहार है,
दूषित भ्रष्ट
आचार है।
(15) अंत
जमघट ठगों का
कर रहा जम कर
परस्पर मुक्त जय-जयकार !
*
शीतक-गृहों में बस
फलो-फूलो,
विजय के गान गा
निश्चिन्त चक्कर खा,
हिँडोले पर चढ़ो झूलो !
जीवन सफल हो,
हर समस्या शीघ्र हल हो !
*
धन सर्वस्व है, वर्चस्व है,
धन-तेज को पहचानते हैं ठग,
उसकी असीमित और अपरम्पार महिमा
जानते हैं ठग !
*
किन्तु;
सब पकड़े गये
कानून में जकड़े गये
सिद्ध स्वामी; राज नेता सब !
धूर्त मंत्री; धर्मचेता सब !
*
अचम्भा ही अचम्भा !
हिडिंबा है; नहीं रम्भा !
*
मुखौटे गिर पड़े नक़ली
मुखाकृति दिख रही असली !
*
(16) रक्षा
देश की नव देह पर
चिपकी हुई
जो अनगिनत जोंके-जलौकें,
रक्त-लोलुप
लोभ-मोहित
बुभुक्षित
जोंके-जलौकें —
आओ
उन्हें नोचें-उखाड़ें,
धधकती आग में झोंकें !
उनकी
आतुर उफ़नती वासना को
फैलने से
सब-कुछ लील लेने से
अविलम्ब रोकें !
देश की नव देह
यों टूटे नहीं,
ख़ुदगरज़ कुछ लोग
विकसित देश की सम्पन्नता
लूटे नहीं !
*
(17) तमाशा
तुम भी घिसे-पिटे सिक्के
फेंक कर चले गये?
अफसोस
कि हम इस बार भी छले गये!
*
देखो-
खोटा सिक्का है न
'धर्म-निरपेक्षता‘ का ?
और दूसरा यह
'सामाजिक न्याय-व्यवस्था‘ का ?
मात्र ये नहीं
और हैं सपाट घिसे काले सिक्के —
'राष्ट्रीय एकता‘ के / 'संविधान-सुरक्षा‘ के
जो तुम इस बार भी
विदूषक के कार्य-कलापों-सम
फेंक कर चले गये!
*
तुम तो भारत-भाग्य-विधाता थे !
तुमसे तो
चाँदी-सोने के सिक्कों की
की थी उम्मीद,
किन्तु की कैसी मिट्टी पलीद !
*
अद्भुत अंधेरे तमाशा है
घनघोर निराशा है,
यह किस जनतंत्र-प्रणाली का ढाँचा है ?
जनता के मुँह पर
तड़-तड़ पड़ता तीव्र तमाचा है !
*
(18) वोटों की दुष्टनीति
दलितों की गलियों से
कूचों और मुहल्लों से,
उनकी झोपड़पट्टी के
बीचों-बीच बने-निकले
ऊबड़-खाबड़, ऊँचे-नीचे
पथरीले-कँकरीले सँकरे पथ से
निकल रहा है
दलितों का
आकाश गुँजाता, नभ थर्राता
भव्य जुलूस !
*
नहीं किराये के
गलफोडू नारेबाज़ नक़लची
असली है, सब असली हैं जी —
मोटे-ताजे, हट्टे-कट्टे
मुश्टंडे-पट्ठे,
कुछ तोंद निकाले गोल-मटोल
ओढे महँगे-महँगे खोल !
*
सब देख रहे हैं कौतुक —
दलितों के
नंग-धड़ंग घुटमुंडे
काले-काले बच्चे,
मैली और फटी
चड्डी-बनियानों वाले
लड़के-फड़के,
झोंपडयों के बाहर
घूँघट काढ़े दलितों की माँ-बहनें
क्या कहने !
चित्र-लिखी-सी देख रही हैं,
पग-पग बढ़ता भव्य जुलूस,
दलितों का रक्षक, दलितों के हित में
भरता हुँकारें, देता ललकारें
चित्र खिँचाता / पीता जूस !
निकला अति भव्य जुलूस !
कल नाना टीवी-पर्दों पर
दुनिया देखेगी
यह ही, हाँ यह ही —
दलितों का भव्य जुलूस !
*
अफ़सोस !
नहीं है शामिल इसमें
दलितों की टोली,
अफ़सोस !
नहीं है शामिल इसमें
दलितों की बोली !
(19) घटनाचक्र
हमने नहीं चाहा
कि इस घर के
सुनहरे-रुपहले नीले
गगन पर
घन आग बरसे !
*
हमने नहीं चाहा
कि इस घर का
अबोध-अजान बचपन
और अल्हड़ सरल यौवन
प्यार को तरसे !
*
हमने नहीं चाहा
कि इस घर की
मधुर स्वर-लहरियाँ
खामोश हो जाएँ,
यहाँ की भूमि पर
कोई
घृणा प्रतिशोध हिंसा के
विषैले बीज बो जाए !
*
हमने नहीं चाहा
प्रलय के मेघ छाएँ
और सब-कुछ दें बहा,
गरजती आँधियाँ आएँ
चमकते इंद्रधनुषी
स्वप्न-महलों को
हिला कर
एक पल में दें ढहा !
*
पर,
अनचाहा सब
सामने घटता गया,
हम
देखते केवल रहे,
सब सामने
क्रमशः
उजड़ता टूटता हटता गया !
(20) निष्कर्ष
उसी ने छला
अंध जिस पर भरोसा किया,
उसी ने सताया
किया सहज निःस्वार्थ जिसका भला !
*
उसी ने डसा
दूध जिसको पिलाया,
अनजान बन कर रहा दूर
क्या खूब रिश्ता निभाया !
*
अपरिचित गया बन
वही आज
जिसको गले से लगाया कभी,
अजनबी बन गया
प्यार,
भर-भर जिसे गोद-झूले झुलाया कभी !
*
हमसफ़र
मुफलिसी में कर गया किनारा,
ज़िन्दगी में अकेला रहा
और हर बार हारा !
(21) आत्म-संवेदन
हर आदमी
अपनी मुसीबत में
अकेला है !
यातना की राशि-सारी
मात्र उसकी है !
साँसत के क्षणों में
आदमी बिल्कुल अकेला है !
*
संकटों की रात
एकाकी बितानी है उसे,
घुप अँधेरे में
किरण उम्मीद की जगानी है उसे !
हर चोट
सहलाना उसी को है,
हर सत्य
बहलाना उसी को है !
*
उसे ही
झेलने हैं हर क़दम पर
आँधियों के वार,
ओढ़ने हैं वक्ष पर चुपचाप
चारों ओर से बढ़ते-उमड़ते ज्वार !
सहनी उसे ही ठोकरें —
दुर्भाग्य की,
अभिशप्त जीवन की,
कठिन चढ़ती-उतरती राह पर
कटु व्यंग्य करतीं
क्रूर-क्रीड़ाएँ
अशुभ प्रारब्ध की !
उसे ही
जानना है स्वाद कड़वी घूँट का,
अनुभूत करना है
असर विष-कूट का !
अकेले
हाँ, अकेले ही !
*
क्योंकि सच है यह —
कि अपनी हर मुसीबत में
अकेला ही जिया है आदमी !
*
(22) दिशा-बोध
निरीहों को
हृदय में स्थान दो
सूनापन-अकेलापन मिटेगा !
*
जिनको ज़रूरत है तुम्हारी —
जाओ वहाँ,
मुसकान दो उनको
अकेलापन बँटेगा !
*
अनजान प्राणी
जोकि
चुप गुमसुम उदास-हताश बैठे हैं
उन्हें बस, थपथपाओ प्यार से
मनहूस सन्नाटा छँटेगा !
*
ज़िन्दगी में यदि
अँधेरा-ही अँधेरा है,
न राहें हैं, न डेरा है,
रह-रह गुनगुनाओ
गीत को साथी बनाओ
यह क्षणिक वातावरण ्ग़म का
हटेगा !
ऊब से बोझिल
अकेलापन कटेगा
*
(23) स्वीकार
अकेलापन नियति है,
हर्ष से
झेलो इसे !
*
अकेलापन प्रकृति है,
कामना-अनुभूति से
ले लो इसे !
*
इससे भागना-बचना —
विकृति है !
मात्र अंगीकार करना —
एक गति है !
इसलिए स्वेच्छा वरण,
मन से नमन !
*
(24) अवधान
कश-म-कश की ज़िन्दगी में
आदमी को चाहिए
कुछ क्षण अकेलापन !
कर सके
गुज़रे दिनों का आकलन !
किसका सही था आचरण,
कौन कितना था जरूरी
या कि किसने की तुम्हारी चाह पूरी,
प्यार किसका पा सके,
किसने किया वंचित कपट से
की उपेक्षा
और झुलसाया
घृणा-भरती लपट से !
*
जानना यदि सत्य जीवन का
तथ्य जीवन का
अकेलापन बताएगा तुम्हें,
सार्थक जिलाएगा तुम्हें !
*
वरदान —
सूनापन अकेलापन !
किसी को मत पुकारो,
पा इसे
मन में न हारो !
रे अकेलापन महत् वरदान है,
अवधान है !
*
(25) सामना
पत्थर-पत्थर
जितना पटका
उतना उभरा !
*
पत्थर-पत्थर
जितना कुचला
उतना उछला !
*
कीचड़ - कीचड़
जितना धोया
उतना सुथरा !
*
कालिख - कालिख
जितना साना
जितना पोता
उतना निखरा !
असली सोना
बन कर निखरा !
*
ज़ंजीरों से
तन को जब - जब
कस कर बाँधा
खुल कर बिखरा
उत्तर - दक्षिण
पूरब - पश्चिम
बह - बह बिखरा !
*
भारी भरकम
चंचल पारा
बन कर लहरा !
*
हर खतरे से
जम कर खेला,
वार तुम्हारा
बढ़ कर झेला !
*
(26) अकारथ
दिन रात भटका हर जगह
सुख-स्वर्ग का संसार पाने के लिए !
*
कलिका खिली या अधखिली
झूमी मधुप को जब रिझाने के लिए !
*
सुनसान में तरसा किया
तन-गंध रस-उपहार पाने के लिए !
*
क्या-क्या न जीवन में किया
कुछ पल तुम्हारा प्यार पाने के लिए !
*
डूबा व उतराया सतत
विश्वास का आधार पाने के लिए !
*
रख ज़िन्दगी को दाँव पर
खेला किया, बस हार जाने के लिए !
*
(२७) असह
बहुत उदास मन
थका-थका बदन !
बहुत उदास मन !
*
उमस भरा गगन
थमा हुआ पवन
घुटन घुटन घुटन !
*
घिरा तिमिर सघन
नहीं कहीं किरन
भटक रहे नयन !
*
बहुत निराश मन
बहुत हताश मन
सुलग रहा बदन
जलन जलन जलन !
*
(28) मूरत अधूरी
तय है कि अब यह ज़िन्दगी
मुहलत नहीं देगी
अब और तुमको ज़िन्दगी
फुरसत नहीं देगी !
*
गुज़रे दिनों की याद कर, कब-तक दहोगे तुम ?
विपरीत धारों से उलझ, कितना बहोगे तुम ?
रे कब-तलक तूफ़ान के धक्के सहोगे तुम ?
*
यों खेलने की, ज़िन्दगी
नौबत नहीं देगी,
अब और तुमको ज़िन्दगी
क़ूवत नहीं देगी !
*
साकार हो जाएँ असम्भव कल्पनाएँ सब,
आकार पा जाएँ चहचहाती चाहनाएँ सब,
अनुभूत हों मधुमय उफनती वासनाएँ सब,
*
यह ज़िन्दगी ऐसा कभी
जन्नत नहीं देगी,
यह ज़िन्दगी ऐसी कभी
किस्मत नहीं देगी !
*
(29) मजबूर
जिन्दगी जब दर्द है तो
हर दर्द सहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
राज है यह जिन्दगी जब
खामोश रहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
है न जब कोई किनारा
तो सिर्फ़ बहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
ज़िन्दगी यदि जलजला है
तो टूट ढहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
आग में जब घिर गये हैं
अविराम दहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
सत्य कितना है भयावह !
हर झूठ कहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
(30) एक रात
अँधियारे जीवन-नभ में
बिजुरी-सी चमक गयीं तुम !
*
सावन झूला झूला जब
बाँहों में रमक गयीं तुम !
*
कजली बाहर गूँजी जब
श्रुति-स्वर-सी गमक गयीं तुम !
*
महकी गंध त्रियामा जब
पायल-सी झमक गयीं तुम !
*
तुलसी-चौरे पर आ कर
अलबेली छमक गयीं तुम !
*
सूने घर-आँगन में आ
दीपक-सी दमक गयीं तुम !
*
(31) सहसा
आज तुम्हारी आयी याद,
मन में गूँजा अनहद नाद !
बरसों बाद
बरसों बाद !
*
साथ तुम्हारा केवल सच था,
हाथ तुम्हारा सहज कवच था,
सब-कुछ पीछे छूट गया, पर
जीवित पल-पल का उन्माद !
आज तुम्हारी आयी याद !
*
बीत गये युग होते-होते,
रातों-रातों सपने बोते,
लेकिन उन मधु चल-चित्रों से
जीवन रहा सदा आबाद !
आज तुम्हारी आयी याद !
(32) स्वागत
जूही मेरे आँगन में महकी,
रंग-बिरंगी आभा से लहकी !
*
चमकीले झबरीले कितने
इसके कोमल-कोमल किसलय,
है इसकी बाँहों में मृदुता
है इसकी आँखों में परिचय,
*
भोली-भोली गौरैया चहकी
लटपट मीठे बोलों में बहकी !
*
लम्बी लचकीली हरिआई
डालों डगमग-डगमग झूली,
पाया हो जैसे धन स्वर्गिक
कुछ-कुछ ऐसी हूली-फूली,
*
लगती है कितनी छकी-छकी
गह-गह गहनों-गहनों गहकी !
*
महकी, मेरे आँगन में महकी
जूही मेरे आँगन में महकी !
(पौत्री इरा के प्रति।)
*
(33) वर्षा-पूर्व
आज छायी है घटा
काली घटा !
*
महीनों की
तपन के बाद
अहर्निश
तन-जलन के बाद
*
हवाओं से लिपट
लहरा उठा
ऊमस भरा वातावरण-आँचर !
*
किसी ने
डाल दी तन पर
सलेटी बादलों की
रेशमी चादर !
*
मोह लेती है छटा,
मोद देती है घटा,
काली घटा !
*
(34) कामना-सूर्य
(1)
हर व्यक्ति सूरज हो
ऊर्जा-भरा,
तप-सा खरा,
हर व्यक्ति सूरज-सा धधकता
आग हो,
बेलौस हो, बेलाग हो !
(2)
हर व्यक्ति सूरज-सा
प्रखर,
पाबन्द हो,
रोशनी का छन्द हो !
जाए जहाँ —
कण-कण उजागर हो,
असमंजस अँधेरा
कक्ष-बाहर हो !
(3)
हर व्यक्ति सूरज-सा
दमकता दिखे,
ऊष्मा भरा
किरणें धरे,
हर व्यक्ति सूरज-सा
चमकता दिखे !
(35) एक सत्य
बन्धन
उभरता है - चुनौती बन
अस्वीकृति बन,
जगाता है सतत
विद्रोह / बल / प्रतिरोध /
ज्वाला / क्रोध।
*
बन्धन
उभरता - स्नेह की उपलब्धि बन,
स्वीकार बन,
जगाता -
मोह / अक्षय सन्धि / अर्पण चाह /
जीवन - दाह।
*
(36) उपलब्धि
सपनों के सहारे
एक लम्बी उम्र
हमने
सहज ही काट ली —
बडे सुख से
सहन से
सब्र से !
मन के गगन पर
मुक्त मँडराती व घहराती
गहन बदली अभावों की
उड़ा दी, छाँट दी
हमने
अटल विश्वास के
दृढ़ वेगवाही वातचक्रों से,
दिन के, रैन के
अनगिनत सपनों के भरोसे !
*
मौन रह अविराम जी ली
यह कठिनतम ज़िन्दगी
हमने
अमन से, चैन से !
सपनो !
महत् आभार,
वृहत् आभार !
*
(37) विचार-विशेष
सपने आनन-फानन साकार नहीं होते
पीढ़ी-दर-पीढ़ी क्रम-क्रम से सच होते हैं,
सपने माणव-मंत्रों से सिद्ध नहीं होते
पीढ़ी-दर-पीढ़ी धृति-श्रम से सच होते हैं !
*
(38) सार्थकता
जिस दिन
मानव-मानव से प्यार करेगा,
हर भेद-भाव से
ऊपर उठ कर,
भूल
अपरिचित-परिचित का अन्तर
सबका स्वागत-सत्कार करेगा,
पूरा होगा
उस दिन सपना !
विश्व लगेगा
उस दिन अपना !
*
(39) अलम
आहों और कराहों से
नहीं मिटेगी
आहत तन की, आहत मन की पीर !
*
दृढ़ आक्रोश उगलने से
नहीं कटेगी
हाथों-पैरों से लिपटी ज़ंजीर !
*
जीवन-रक्त बहाने से
नहीं घटेगी
लहराती लपटों की तासीर !
आओ —
पीड़ा सह लें,
बाधित रह लें,
पल-पल दह लें !
*
करवट लेगा इतिहास,
इतना रखना विश्वास !
*
(40) चाह
जीवन अबाधित बहे,
जय की कहानी कहे !
*
आशीष-तरु-छाँह में
जन-जन सतत सुख लहे !
*
दिन-रात मन-बीन पर
प्रिय गीत गाता रहे !
*
मधु-स्वप्न देखे सदा,
झूमे हँसे गहगहे !
*
मायूस कोई न हो,
लगते रहे कहकहे !
*
हर व्यक्ति कुन्दन बने,
अन्तर-अगन में दहे !
*
अज्ञात प्रारब्ध का
हर वार हँस कर सहे !
*
(41) सम्भव — 1
आओ
चोट करें,
घन चोट करें —
परिवर्तन होगा,
धरती की गहराई में
कम्पन होगा,
चट्टानों की परतें
चटखेंगी,
अवरोधक टूटेंगे,
फूटेगी जल-धार !
*
आओ
चोट करें,
मिल कर चोट करें —
स्थितियाँ बदलेंगी,
पत्थर अँकुराएंगे,
लह-लह
पौधों से ढक जाएंगे !
(42) सम्भव — 2
आओ
टकराएँ,
पूरी ताक़त से टकराएँ,
आखर
लोहे का आकार
हिलेगा,
बंद सिंह-द्वार
खुलेगा !
मुक्ति मशालें थामे
जन-जन गुज़रेंगे,
कोने-कोने में
अपना जीवन-धन खोजेंगे !
नवयुग का तूर्य बजेगा,
प्राची में सूर्य उगेगा !
आओ
टकराएँ,
मिल कर टकराएँ,
जीवन सँवरेगा,
हर वंचित-पीड़ित सँभलेगा !
(43) विपत्‌
आख़िर,
गया थम !
उठा-
चीखता
तोड़ता - फोड़ता
लीलता
क्रुद्ध अंधड़ !
*
तबाही.... तबाही.... तबाही !
*
इधर भी; उधर भी
यहाँ भी; वहाँ भी !
दीखते
खण्डहर.... खण्डहर.... खण्डहर,
अनगिनत शव !
सर्वत्र निस्तब्धता,
थम गया रव !
*
दबे,
चोट खाये,
रुधिर - सिक्त
मानव... मवेशी... परिन्दे
विवश तोड़ते दम !
*
भयाक्रांत सुनसान में
सनसनाती हवा,
खा गया
अंग-प्रति-अंग
लकवा !
अपाहिज
थका शक्ति-गतिहीन जीवन,
विगत-राग धड़कन !
*
भयानक क़हर
अब गया थम,
बचे कुछ
उदासी-सने चेहरे नम !
*
सदा के लिए
खो
घरों-परिजनों को,
बिलखते
बेसहारा !
असह
कारुणिक
दृश्य सारा !
*
चलो,
तेज अंधड़
गया थम !
गहर गमज़दा हम !
*
(44) स्व-तंत्र
आकाश है सबके लिए,
अवकाश है सबके लिए !
*
विहगो !
उड़ो,
उन्मुक्त पंखों से उड़ो !
*
ऊँची उड़ानें
शक्ति-भर ऊँची उड़ानें
दूर तक
विहगो भरो !
विश्वास से ऊपर उठो;
गन्तव्य तक पहुँचो,
अभीप्सित लक्ष्य तक पहुँचो !
*
ऊँचे और ऊँचे और ऊँचे
तीव्र ध्वनि-गति से उड़ो,
निडर होकर उड़ो !
आकाश यह
सबके लिए है —
असीमित
शून्याकाश में
जहाँ चाहो मुड़ो,
जहाँ चाहो उड़ो,
*
ऐसे मुड़ो; वैसे मुड़ो,
ऐसे उड़ो; वैसे उड़ो,
सुविधा व सुभीते से उड़ो !
अपने प्राप्य को
हासिल करो !
स्वच्छंद हो, निर्द्वन्द्व हो,
ऊर्ध्वगामी, ऊर्ध्वमुख;
गगनचुम्बी उड़ानें
दूर तक
विहगो भरो !
*
न हो
कोई किसी की राह में,
बाधक न हो
कोई किसी की
पूर्ण होती चाह में !
*
स्वाधीन हों सब
स्वानुशासन में बँधे,
हम-राह हों
सँभले सधे !
*

संपर्क :
डा. महेंद्र भटनागर
110 बलवंतनगर, गांधी रोड,
ग्वालियर - 474 002 (म. प्र.)
फोन : 0751-4092908
ई-मेल :
drmahendrabh@rediffmail.com
drmahendra02@gmail.com

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